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कॉन्स्टेंटाइन ने पूर्वी सम्राट लिसिनियस के साथ मिलकर 313 ईस्वी में "मिलान का आदेश" (Edict of Milan) जारी किया। यह एक क्रांतिकारी कदम था, क्योंकि इस आदेश ने रोमन साम्राज्य में सभी धर्मों, विशेषकर ईसाई धर्म को, कानूनी मान्यता प्रदान की। इससे पहले ईसाइयों पर अत्याचार होते थे, उन्हें शेरों के आगे फेंक दिया जाता था और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाती थी। मिलान के आदेश ने इन अत्याचारों को समाप्त कर दिया और ईसाई धर्म को फलने-फूलने का अवसर दिया।

कॉन्स्टेंटाइन ने सिर्फ ईसाई धर्म को स्वतंत्रता ही नहीं दी, बल्कि उसके भीतर एकता स्थापित करने का भी प्रयास किया। 325 ईस्वी में उन्होंने 'निकिया की परिषद' (Council of Nicaea) बुलाई। यह ईसाई इतिहास की पहली विश्वव्यापी परिषद थी, जिसमें ईसा मसीह के देवत्व और त्रिएकत्व (ट्रिनिटी) सिद्धांत को मान्यता दी गई। इस परिषद ने नाइसिन पंथ (Nicene Creed) की रचना की, जो आज भी कई ईसाई संप्रदायों में प्रार्थना का हिस्सा है।

305 ईस्वी में डायोक्लेटियन के सेवानिवृत्त होने के बाद सत्ता के लिए खूनी संघर्ष शुरू हो गया। कॉन्स्टेंटाइन अपने पिता की सेना में शामिल हो गए और 306 ईस्वी में पिता की मृत्यु के बाद सेना ने उन्हें सम्राट घोषित कर दिया। इसके बाद के वर्षों में, उन्हें कई विद्रोहियों और प्रतिद्वंद्वी शासकों से लोहा लेना पड़ा।

यहाँ विषय "कॉन्स्टेंटाइन" पर हिंदी में एक लेख प्रस्तुत है:

प्रभावित होकर, कॉन्स्टेंटाइन ने अपने सैनिकों की ढालों पर ईसाई प्रतीक 'क्राइस्टोग्राम' (Chi-Rho) बनवा दिया। मिल्वियन ब्रिज के युद्ध में उन्होंने मैक्सेंटियस को बुरी तरह पराजित किया। यह जीत रोमन साम्राज्य के लिए तो चरम पर थी ही, साथ ही इसने कॉन्स्टेंटाइन को ईसाई धर्म की तरफ झुका दिया। हालाँकि उनका पूर्ण बपतिस्मा अपने जीवन के अंतिम समय (337 ईस्वी) में हुआ, लेकिन इस घटना के बाद से वे ईसाई धर्म के संरक्षक बन गए।

कॉन्स्टेंटाइन का जन्म लगभग 272 ईस्वी में मेसिया (आधुनिक सर्बिया) में हुआ था। उनके पिता कॉन्स्टेंटियस क्लोरस रोमन सेना के एक उच्च अधिकारी थे और बाद में पश्चिमी रोमन साम्राज्य के सम्राट बने। कॉन्स्टेंटाइन ने अपनी युवावस्था का अधिकांश समय सम्राट डायोक्लेटियन के दरबार में बिताया, जहाँ उन्होंने सैन्य और प्रशासनिक कौशल सीखे।

कॉन्स्टेंटाइन द ग्रेट केवल एक सम्राट नहीं थे, बल्कि एक युग-प्रवर्तक थे। उन्होंने प्राचीन रोमन दुनिया को मध्ययुगीन और बीजान्टिन दुनिया में बदल दिया। उनके कारण ही ईसाई धर्म भूमिगत गुफाओं से निकलकर विशाल गिरिजाघरों तक पहुंचा। आज भी जब इतिहासकार उनके शासनकाल का विश्लेषण करते हैं, तो वे उन्हें मानव इतिहास के सबसे प्रभावशाली शासकों में गिनते हैं। कॉन्स्टेंटाइन के बिना, रोम और यूरोप का इतिहास पूरी तरह से अलग होता।